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मंडल पर भारी कमंडल

Posted On: 16 Mar, 2017 Politics में

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विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के सबसे बड़े सूबे के चुनाव परिणामों ने दुनिया का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित किया है. यूपी के चुनावी नतीजों से यह साफ हो गया है कि लोकसभा चुनाव के 3 साल बाद भी मोदी लहर बरकरार है. 2014 के लोकसभा चुनाव में यूपी में भाजपा को जहां 43% वोट मिले थे वहीं इस बार के विधानसभा चुनाव में भाजपा 41% वोट पाने में कामयाब रही. नतीजों से यह साफ हो गया पिछड़े, यादव, दलित और मुस्लिम अब किसी खास राजनीतिक दल के वोट बैंक नहीं रहे. इससे यह भी साफ हो गया कि यूपी के दलितों की अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता है. जो दलित समाज अबतक बसपा का वोटबैंक हुआ करती थी उसपर भाजपा ने सेंध लगा दी है. जिस भाजपा को अगड़ों की पार्टी कहा जाता था वह आज एक ऐसी पार्टी बनकर उभरी है जिसे समाज के सभी वर्गो का समर्थन प्राप्त है.

वी. पी. सिंह के मंडल के फरमान के बाद से ही भाजपा कमंडल की राजनीति कर रही है. इस बार के चुनावी रैलियों के भाषणों में भी श्मशान-कब्रिस्तान और दीवाली-रमजान जैसे धर्म के नाम पर राजनीतिक बयानबाज़ी ने भी कहीं न कहीं ध्रुवीकरण का काम अवश्य किया. भाजपा की हिंदुत्व की राजनीति ने क्षेत्रीय दलों का जातिगत समीकरण बिगड़ दिया. यही वजह है कि भाजपा गठबंधन 325 सीटों के विशाल जनादेश के साथ 15 साल का वनवास ख़त्म करने में कामयाब रहीं. ध्रुवीकरण के कारण ही भाजपा 115 सीटें जिसमें मुस्लिम आबादी निर्णायक भूमिका में है, में 85 सीटें जीतने में कामयाब रहीं जबकि 2012 के विधानसभा चुनाव में इन्ही सीटों पर केवल 22 सीटें मिली थी. चुनाव नतीजों से यह भी साफ हो गया कि इस बार तुष्टिकरण की राजनीति भी नहीं चली चाहे वह मायावती द्वारा 97 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देना हो या अपने आप को सेक्युलर कहने वाली राजनीतिक पार्टियों का एक सुर में तीन तलाक़ का समर्थन करना.

नोटबंदी का मुद्दा भी पूरे चुनाव में छाया रहा परंतु इसका विरोध करने वाले जनता के मिज़ाज को पहचानने में नाकाम रहें. यही वजह है कि नीतीश कुमार को यह कहना पड़ा कि विपक्षी दलों को इतने बड़े पैमाने पर नोटबंदी का विरोध करने की ज़रूरत नहीं थी. इस जीत में सबसे निर्णायक भूमिका अगर किसी ने निभाई तो वह है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. जब प्रधानमंत्री ने वाराणसी में रोड शो किया तब वह विरोधियों के निशाने पर ज़रूर रहे परंतु बनारस की सभी सीटें जीतकर तथा पूर्वांचल में उत्कृष्ट प्रदर्शन करके उन्होंने विरोधियों को करारा जवाब भी दिया. यूपी की इस जीत का सबसे अधिक लाभ भाजपा को राज्यसभा में मिलेगा. साथ ही साथ इसी साल जुलाई में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में भी भाजपा अपने मनपसंद उम्मीदवार को राष्ट्रपति बना सकती है. यह भी हो सकता है कि इस बार हमें कोई संघ का व्यक्ति राष्ट्रपति के रूप में नज़र आए.

यूपी की इस शानदार जीत ने विपक्षी दलों को कहीं न कहीं यह सोचने पर भी मजबूर कर दिया है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को रोक पाना कठिन है. यही कारण है कि उमर अब्दुल्ला ने यहां तक कह दिया कि अब विरोधियों को 2019 के बारे में नहीं बल्कि 2024 के बारे में सोचना चाहिए. चुनाव नतीजों से एक दिन पहले अखिलेश द्वारा मायावती से गठबंधन के संकेत ने कहीं न कहीं यह भी इशारा कर दिया है कि अपना वर्चस्व बचाने के लिए भविष्य में ये दोनों दल जदयू और राजद की तरह साथ आ सकते हैं. बड़ा सवाल यह है कि क्या यूपी के चुनावी नतीजों ने भाजपा के लिए 2019 की ज़मीन तैयार कर दी है, अगर हाँ तो क्या 2019 में कॉंग्रेस क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन कर भाजपा के खिलाफ चुनावी घेराबंदी करने में कामयाब हो पाएगी?

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