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राम बनाम मीरा या दलित बनाम दलित?

Posted On: 29 Jun, 2017 Politics में

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राष्ट्रपति चुनाव के लिए मंच तैयार है. एक तरफ जहाँ एनडीए ने बिहार के राज्यपाल और दो बार के राज्यसभा सांसद रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया है तो दूसरी तरफ यूपीए ने पूर्व लोकसभा अध्यक्ष और पाँच बार की लोकसभा सांसद मीरा कुमार को मैदान में उतारा है. हालाँकि यह भी सच है कि रामनाथ कोविंद की जीत लगभग तय है. एनडीए के अलावा जिन दलों ने कोविंद को समर्थन दिया है उनमें नीतीश कुमार की जेडीयू, के. चंद्रशेखर राव की तेलंगाना राष्ट्र समिति, जगनमोहन रेड्डी की वाईएसआर कॉंग्रेस, ओडिशा की सत्ताधारी पार्टी बीजू जनता दल और तमिलनाडु की एआइएडीएमके प्रमुख है.

दोनों उम्मीदवारों के चयन से यह साफ़ हो गया कि हमारे देश में कोई भी चुनाव जातिगत राजनीति के नहीं हो सकता. राष्ट्रपति पद के दोनों उम्मीदवार दलित वर्ग से हैं और इस देश की त्रासदी यह है कि 21वीं शताब्दी में अब तक 5 लाख से ज़्यादा दलित उत्पीड़न के मामलें दर्ज हो चुके हैं. संयोग यह है कि दलित उत्पीड़न के मामलों में जो दो राज्य सबसे अव्वल है उसमें पहले नंबर पर यूपी है जहाँ से रामनाथ कोविंद आते हैं और दूसरे नंबर पर बिहार है जहाँ से मीरा कुमार आती है. अब यह बात भी सच है कि अगला राष्ट्रपति इन्हीं दो राज्यों में से एक का होगा. बीजेपी ने रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित कर मानो एक तीर से कई निशानें किए हैं. एक तरफ जहाँ वह संघ को खुश करने में कामयाब रही है वहीं दूसरी तरफ दलित वोट बैंक में भी सेंध लगाने की कोशिश की है जो परंपरागत रूप से बीजेपी के खिलाफ रहती है.

कोविंद वर्तमान में बिहार के राज्यपाल हैं तो हो सकता है कि अगले बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी को इसका कुछ लाभ दिखाई दे. बीजेपी ने इस चयन से जो सबसे बड़ी उपलब्धि पाई है वह है विपक्ष को बाँटने में. नीतीश कुमार ने खुलकर कोविंद का समर्थन किया है. जेडीयू पर कॉंग्रेस-आरजेडी द्वारा जमकर बयानबाज़ी भी हो रही है जिससे कहीं न कहीं महागठबंधन में दरार के संकेत भी मिल रहे हैं. शायद कुछ लोगों को याद न हो परंतु यह वही रामनाथ कोविंद हैं जिन्होंने नीतीश सरकार के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान तेजप्रताप यादव को अपेक्षा की जगह उपेक्षा कहने पर टोका था और दोबारा शपथ लेने के लिए कहा था. शायद यह भी एक कारण है कि लालू उनके नाम की घोषणा के बाद से ही उनका विरोध करते आ रहे हैं. अगर मीरा कुमार का चयन कॉंग्रेस पहले कर लेती तो नीतीश कुमार के लिए बिहार की बेटी का विरोध कर पाना मुश्किल होता परंतु यह भी सच है कि यदि बीजेपी किसी गैर-दलित को उम्मीदवार बनाती तो मीरा कुमार कॉंग्रेस की प्रत्याशी नहीं होती. कॉंग्रेस यह बताने में लगी है कि रामनाथ कोविंद के मुक़ाबले मीरा कुमार ज़्यादा योग्य और काबिल उम्मीदवार है. कॉंग्रेस मीरा कुमार से ज़्यादा उनके पिता जगजीवन राम की योग्यता बताने में लगी है. वही जगजीवन राम जो इंदिरा गाँधी द्वारा इमरजेंसी लगाए जाने के बाद उनके कट्टर विरोधी बनकर उभरे थे और इमरजेंसी के बाद हुए चुनाव के बाद मोरारजी देसाई की सरकार में देश के उप-प्रधानमंत्री थे.

आज़ादी के 70 साल बाद भी दलित ग़रीबी में जीने को मजबूर है. आज भी देश की 90 प्रतिशत दलित आबादी किसानी और मज़दूरी करके जीवन व्यापन कर रही है. एक तरफ भारत जहाँ दुनिया में महाशक्ति के रूप में उभर रहा है वहीं दूसरी तरफ दलितों को आज भी अछूत के रूप में देखा जाता है. उन्हें मंदिरों में घुसने नहीं दिया जाता. देश के कई हिस्सों में दलित सिर पर मैला तक ढोते हैं. दलितों की साक्षरता दर सामान्य से काफ़ी कम है. रामनाथ कोविंद हो या मीरा कुमार ये दोनों इस घटना के अलावा किसी कोने से दलित नहीं हैं कि इनका जन्म दलित परिवार में हुआ है. दोनों ही क्रीमी लेयर के उस प्रथम लेयर में आते हैं जिन्हें आरक्षण की सुविधा से वंचित करने की सिफारिश उच्चतम न्यायालय भी कर चुका है. परंतु दलित राष्ट्रपति उम्मीदवार चुनकर इस देश की राजनीतिक पार्टियाँ यह साबित करने में लगी हैं कि उन्हें हासिए में पड़े दलित वर्ग की बहुत फ़िक्र है. बड़ा सवाल यह है कि क्या वर्तमान राजनीति ने 16 प्रतिशत दलित वोटबैंक को सत्ता की चाबी मान लिया है और क्या यह राष्ट्रपति चुनाव दलित बनाम दलित बन कर रह गया है?

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